किस बात की सज़ा मिली मुझे यार
किसी को चाहना क्या खता है यार
कहे मुझसे खुश रहा करूँ हर वक़्त
सोच तेरे बिन कितना गरीब हूँ यार
दिन गुज़रता है बस किसी तरह से
तन्हा रातों के साये बड़ा डराते यार
वो तेरी खनकती चूड़ियाँ प्यारी बातें
कहीं कोई ख्वाब देखा तो न था यार
तुम्हारे दिल में बस कर रहूं ये आरज़ू

या निकले आखिर साँस तेरे दर यार

मुस्कुराहटें होंठों की कभी कम न होने देना,
ज़माने का क्या कब फूल बरसाए इसने
ज़िन्दगी का क्या है कब कब हुईं किसो की,
वक़्त कैसा भी रहे होंसले न टूटने देना

ये सच है झोपडी में मिलती खुद्दारी की झंकार मगर कुछ महल भी अछूते नहीं
बईमानों की भीड़ भरी महफ़िल में ईमानदारी की चीखें कहाँ सुनाई देती

गर दौलत में दम होता तो अमीर कोई परेशान न होता
लग जाती कतारें गरीब की शाम में कोई स्थान न होता

मैं और तुम मिलकर आओ
एक नया जहाँ बना लें
जहाँ हमारे सिवा कोई दूजा न हो

इतने बुरे भी न जितना तुम ने मान लिया
तुम्हें पसंद किया क्या हमनें गुनाह किया

शुक्र है खुदा का कुछ एहसास तो हुआ
वरना खामखा पत्थर से सर टकरा रहे थे

जीवन के इस मोड़ पर
निकले उम्मीद संजो कर
शाम बाद सुबह भी होती
अंधेरों का दामन छोड़ कर

पर कुछ ऐसे भी होते एक तरफ़ा दोस्ती पर रिश्ते निभवाते
एक बार मुंह सूज़ा लें तो लाख मिन्नत बाद भी कभी न मानते

अपने ख्वाबों से कह दो मुलाक़ात की ज़िद्द न करें
दीदार बाद ख्वाबों की ख्वाहिशें और बढ़ जाती हैं

वक़्त की नज़ाक़त मि किस ने कब की परवाह?
मेहबूब के आने का कब किया इंतज़ार
वो दिन और हुए जब मुहब्बत पाक साफ थी,
अब तो हर दिन इजहार हो फिर इंकार

किसी को हम से दिकत हो
ये कह नहीं बचना हमे क्या
मैं खुली किताब की तरह हूँ
आ एक बार पढ़ कर तो देख
गुज़रता ही नहीं इक pal इनके बिना
जो थे कभी दिल के करीब
वो ज़िन्दगी से कुछ ऐसे गए लगने लगा
हम हो गए हैं गरीब

अपने बीमार के लिए
नर्स माँ जैसी होती है
दिन रात सेवा करती
मगर मांगती न कुछ

गुज़रता ही नहीं इक pal इनके बिना
जो थे कभी दिल के करीब
वो ज़िन्दगी से कुछ ऐसे गए लगने लगा
हम हो गए हैं गरीब

अपने बीमार के लिए
नर्स माँ जैसी होती है
दिन रात सेवा करती
मगर मांगती न कुछ

काश इस गधे से तुझे प्यार हो जाये तेरा सरनेम बदल जाये
घूमें जब नन्हे घर आँगन तेरे लबीं मेरा असली नाम आ जाए

जो रुस्वाई करे यार की
वो मुहब्बत क़ाबिल नहीं
हमनें चाहा ज़माने से छिपा
किसी और के तल्बगार नहीं

मुहब्बत खुदको करनी न आई बेवफा हमें बना दिया
क्या गया हमारा खुदको सर-ए-बाजार रुस्वा करा लिया

ये इश्क़ है जनाब अव्वल तो होता नहीं
और अगर हो जाये अच्छे अच्छों का दिनाग हिला दे

काश सीख लेती पैग बनाना छोड़ देता वो बोतल उठाना
खूब करता तेरी आँखों से नशा चाय भी पीता जां लुटाता

न छेड़ दिल के अरमानों को बहक गया तो सितम होगा
न जाने फिर किस गली रौशनी कहाँ कहाँ अँधेरा होगा

मुहब्बत कोई लुक्का छिप्पी नहीं
करि और पतली गली हो लिए
दो दिलों का मेल उम्र भर का साथ
जो टूटे मौत के ही बाद

यूँ मुहब्बत को सर-ए-आम न कर,
बदनाम हो जायेगी ये काम न कर
यही जीवन आना जाना लगा रहता,
भूल उसे अपनों के कुछ काम कर

जब मिलने रूबरू न आओगे तो ख्वाबों में ही आ तड़पाएँगे?
दिन में जितना तड़पाते तरसाते हिसाब कुछ यूँ ही चुकाएंगे

पहले मुहब्बत दिल से होती थी इसिलए तो अंधी थी
दिमाग अब नाप तौल प्यार करे हक़ीक़त में व्यापर करे

उन्हें बड़ा नाज़ था खुद पर और अपना दिल न देने पर
इक दिन कोई बंजर ज़मीं पर फूल खिला दीवाना बना गया

बहुत शौक है बेवफा बेवफा कहने
पानी में आग लगाने का
कोई न गर हो गई मुहब्बत याद करोगे
तकिया भिगो भिगो

देखो देखो दिए की लौ कैसे टिमटिमा रही,
शायद मुझे ज़िन्दगी का सबक सिख रही,
इक दिन जो रोशन है जीवन बुझ जानी लौ,
आने वाले वक़्त का अहसास करा रही l
प्यार हमनें तो किया था उम्र भर का
साथ निभाने के लिए
गर्दिश-ए-हवा यूँ चली तिनका तिनका
हो सब बिखर गया

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Posted on May 2, 2020, in Shayari Khumar -e- Ishq. Bookmark the permalink. Leave a comment.

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