Category Archives: Shayari-e-Dard

बेवफा…


चली जो गर्दिश-ए-हवा,
जिन शाखाओं को तकिया बना सोते थे.!
वो भी उन नामुरादों का,
साथ देती चली गयी.!!

ये जीवन है.!!


ये जीवन है उतार-चढ़ाव जीवन का अंग है।
रिश्ते बनते बिगड़ते रहते किन्तु इसका मतलब ये नहीं
हम सदा के लिए सम्बन्ध तोड़ लें
राजा-महाराजाओं की लड़ाइयां हुई,राष्ट्रों की होती बाद
आखिर में समझौता रकना ही होता अपनों के लिए या
औरों के लिए?
तीज-त्यौहारों पर तो खुद पर नियंत्रण कर मुस्कुरा मिलना चाहिए बात बातें करनी चाहिए
इज़्ज़त तो हर किसी की होती
“राह चलतों की भी और और दो-चार लाख महीना कमाने वालों की भी”
बड़ा वो होता जो झुकता है?वो नहीं जो मदमस्त हाथी माफिक रहे?

सदा रहने न कोई आया और न ही रहेगा “सागर”.!
जाने हर कोई फिर भी मुंह चढाने में इज़्ज़त समझे.!!

 

पागल…


तंग आ चुके’सागर‘ इस दस्तूर-ए-उल्फत से अब.! 

कोशिशें तम्माँ की मगर आखिर पागल कहलाये.!!

खुदगर्ज़ रिश्ते…


न वो वादे रहे न वो कसमें,
वो दिन और हुए जब जान क़ुर्बान हुआ करती.!

आज  रिश्ते  हुए  खुदगर्ज़,
कली खिलने से पहले ही फूल बन जाय करती.!!

इश्क़…


किया है इश्क़ ज़िन्दगी में ‘सागर’एक से ही.!

और बात दिल रखने दिल तोड़ते न किसी का.!!

जुदाई का गम.!!


जुदाई का गम थोड़ा थोड़ा करके कम होता जाता .!

जैसे नदियों से रिस्ता पानी जा ‘सागर‘ मिल जाता .!!

दर्द.!!


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इक बार किया था इश्क़”सागर“एक महज़बीन से,
मिल गया दर्द तह उम्र का शायरी के लिए.!

छोड़ सारे काम बस मेहबूब गली रहा आना-जाना,
वक़्त गुज़रे जाना काम कई जीने के लिए.!!

नादाँ”सागर”…!!


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 दो पल की मुलाक़ात को जन्मों का रिश्ता समझ बैठे.!

नादाँ थे”सागर“दुनियां समझने में ज़रा जल्दी कर बैठे.!!

आरज़ू.!!


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जन्म-जन्म का साथ निभाने की दिली आरज़ू है,
लेकर करार रातों का सेज़ सजाने की आरज़ू है.!

दीदार हो तेरा हर पल यही हसरतों की आरज़ू है,
सागर“की तेरी बाँहों में दम तोड़ने की आरज़ू है.!!

परेशां हो दर्द-ए-दवा क्या करोगे.!!


रहने दो मेरे रंज-ओ-गम मेरे पास वक़त इलाज़ है.!

तुम खुद ही परेशां हो मेरी दर्द-ए-दवा क्या करोगे.!!

दिल…


दिल में उतर कर इक बार देख तो लेती,
क्या पता ज़माने में हम-सा न मिला हो कोई.!

माना बाज़ार-ए-इश्क़ में कई दीवानें यार,
चाहे शिद्दत से पर आह निकले न जुबां कोई.!!

फुरसत.//


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यहाँ ज़िन्दगी गुज़री है तमां”सागर“उलझनों से भरी-भरी./

फुरसत न मिली यारो कभी खुद खातिर सोचने के लिए.//

रुखसत.!!


टूट कर बिखर जाऊं इससे पहले दामन में छुपा ले.!

फिर न कहना जो बाद ज़माने से रुखसत हो जाऊं.!!

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तुझे मुहब्बत ना थी मेरे अरमानों से.!!


तुझे मुहब्बत ना थी मेरे अरमानों से,
वरना मेहंदी यूँ और नाम लगाती ना.!

करती इंतज़ार मेरा क़यामत की हद,
डोली में बैठ गैर संग सेज़ सजाते ना.!!

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क्या दिन थ.!!


क्या दिन थे जब खवाबों में रहा करते थे.!

बातें करते “सागर” रतियों जगा करते थे.!!

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kya din the jab khwabon mein raha karte the.!

Baatein kiya karte”Sagar”ratiyon jga karte the.!!

उनको भूल गया हूँ


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कुछ इस तरह से “सागर” बदल गया हूँ
अब उन को ही भूल गया हूँ .!

जब भी देखता आइना वो नज़र न आते,
अपनी सूरत ही बदल गया हूँ .!!

अक्सर…


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बेवफा कहना बताना अक्सर हुस्न की आदत रहा “सागर“.!

इश्क़ जान दे बेशक अपनी फिर भी बेवफा ही कहलाया.!!

मिली है आप से जीने की वजह.!!


हम को मिली है आप से जीने की वजह,
इंकार कर न छीनिये ये हसीं जहाँ.!

न होंगे तो देखना तुम तड़पोगे एक दिन,
ढूंढोगे हमें पर हम न मिलेंगे यहाँ.!!

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Hum ko mili hai aap se jeene ki vajha,

Inqaar kar na chiniye ye haseen jahan.!

Na honge to dekhna tum tadpoge ek din,

Dhoondoge hume par hum na mileinge yahan.!!

पहरे…


न कर इंतज़ार कुछ न मिलेगा.!

यहाँ वफ़ा पर पहरे हैं अनेक .!!

जुदाई.!!


क्यों की थी मुहब्बत इस क़द्दर जुदाई का गम सह न सको./

यक़ीन रख खुदा पर”सागर“शायद इसमें भी कोई रज़ा हो.//

मसला…


उसने वादा है किया रात आने का,
चाँद-सा चेहरा दिखाने का./

शाम-सवेरे होते हैं दुनियां के पहरे,
सबके सोने बाद आने का.//

ज़नाज़ा मुहब्बत का…


ज़नाज़ा उठने को जब मुहब्बत का वो आये हैं इजहार करने.!

वक़्त रहते एहसास गर होता “सागर“यूँ आज अश्क़ न बहाते.!!

दुआ.!!


दुआ रब्ब से यही मेरी क़बूल हो तेरी दुआ.!

मिले उसी जगह जहाँ मांगी थी हमनें दुआ.!!

कमी.!!


पाक वफाओं में उनके या फिर इन के कुछ कमी रही होगी”सागर“.!

वरना ज़िन्दगी में गिले-शिक़वे होते फिर भी मुहब्बत परवान चढ़ती.!!

ज़हर.!!


मुहब्बत की है तो जलना भी होगा,
किसी की याद में तड़पना भी होगा.!

वफ़ा करने वाले उफ़ तक न करते,
गर जीना”सागर“ज़हर ये पीना होगा.!!

 

 

 

दर्द .//


मुहब्बत भरा दर्द मुक़द्दर वालों को नसीब”सागर“./.

बहुत हैं जो इस हसीं दर्द की ख्वाहिश लिए जाते .//

अब तुझे क्या कहूं..


तुझे मनाने की तम्माम कोशिशें नाकाम हुई,
ज़िन्दगी इस जन्म में बेकार हो गयी.! 

ज़िद्दी कहूं नादाँ या मगरूर समझ न आता,
तेरी सोच क्यों दुशमन -सी हो गयी.!!

Tujhe manane ki tammam koshishein naqaam hui,

Zindagi is janm mein bekaar ho gyi.!

Ziddi  kahun  nadaan  ya  magrur  samjh  na  aata,

Teri soch kyun dushamon-si ho gyi.!!

बिखरने की आदत नहीं.!!


मुझे टूट कर बिखरने की आदत नहीं,
साम ले मुझे इससे पहले के बिखर जाऊं.!

शक न कर मेरी बेइतंहा मुहब्बत पर,
दुआ है मैं भी किसी दिन तेरे काम आऊं.!!

कभी-कभी.!!


कभी इस कभी उस संग होता.!

मुक़द्दर कभी अपना नहीं होता.!!

यूँ न कर…


न कर मुझसे यूँ सर-ए-राह छेड़ा-छेड़ी दिल तुझ पर आ जाएगा.!

सारी दुनिया में बदनाम करेगी “सागर” नाम मशहूर हो जाएगा.!!

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