Lamhein


अभी तो दूध के दांत भी न टूटे
इश्क़ कैसे करलें,
मम्मी से दूध पीते तेरे से कॉफ़ी
भला कैसे पी लें…

तुझ से मुहब्बत कितनी तुझे एहसास करा जाएंगे,
रख Wallet में तेरा फोटो दुनियां से चले जाएंगे…

ए दिल रूठने मनाने का ज़रा वक़्त तो निकाल,
सुना है मुहब्बत में पड़ तेरे पास वक़्त ही न रहा…

शाम ए गम और तन्हा रातें जीने न देंगी,
पियें कितना भी मगर उसे भूलने न देंगी…

उफ़ यूँ इक़रार ए मुहब्बत क्यूँ कर दिया,
भरी महफ़िल में खुदको रुस्वा कर लिया…

मेरे जीते जी मेरे हो न पाए
हो जाये गर यक़ीन मुझ पर तो…
अश्क़ बहाना न बेशक मगर
मेरी मज़ार पर मिलने आ जाना…

वो सब सत युग की बातें थी,
अब वफ़ा बिस्तर पे दम तोड़ती…

अब मुझ से मिलने की ख़ाहिश ना रख,
तुझे वादा निभाना न आता मुझे तोडना…

तुम अपनी निगेहबानी मुझे देदो,
दे अपने गम मुझ से ख़ुशी लेलो…

आज फिर इक बेवफा से मुलाकात हो गई,
ज़िन्दगी फिर बेज़ार हो गई…
गरजपरस्त ज़माने में हर और मगरूरियत है,
मुहब्बत फिर बाजार हो गई…

अब के जो मिलेगी इक़रार कर दूंगा
हाँ जो कहेगी फिर हाथ थाम लूंगा…
बड़ा तंग करती है रात ख्वाबों में आ
रातों का कुछ यूँ इंतज़ाम कर लूंगा…

फल्क़ पे पत्थर से निशाना लगाने वालो
ये न भूलो तुम,
जितनी जल्दी जाने में लगी उससे तेज वो
लौट के आएगा…

देखो करते हो जो प्यार तो
किया वादा निभाया करो…
रात जगाना अच्छी बात नहीं
रोज़ रोज़ न तड़पाया करो…

मुहब्बत एक इबादत है
ये नहीं के I Love You कहा
और काम हो गया…

इश्क़ में दिल को बेक़रार किया
क्या खता थी तुझ संग प्यार किया…

न क़बूल था तो मना ही कर देती
क्यों रुस्वा मुझे सर ए बाजार किया…
उफ़ कम्बक्ख्त इतनी हसीं और खोने की बातें,
इक बार मिलो तो सही प्यार भी होगा इक़रार भी…

ना तेरा प्यार हूँ ना तेरा इक़रार हूँ,
फिर बता वफ़ा करूँ तो कैसे करूँ…

इश्क़ फसलों से ही हुआ करता है हज़ूर,
करीब रहकर तो जिस्म का मिलन होता…

इक बार नहीं सौ बार नहीं हर जन्म में प्यार तुझी से करेंगे,
जनता”सागर”तू बेवफा है फिर भी एतबार तुझे पर करेंगे…

तेरी हर दुआ अब क़ामिल हो,
बेशक मेरा नाम न शामिल हो…

रात अँधेरे में मुझसे क्या गज़ब हो गया,
देना था जो फूल उसकी माँ को दे दिया…
पता चला मेरे पापा को तो लाल हो गए,
घर में मेरे He सौतन वाले हाल हो गए…

ना पूछ मुझसे मेरी बेक़रारी का आलम,
जब देखूं आइना आँखों में तुझे पाता हूँ…

तेरी बेवफाई की बातें हैं सब
हर दूजे शक़्श को तूने चाहा है…

तेरी मुहब्बत तुझे मुबारक़ हो
मिले जिसे तूने दिल से चाहा है…

मेरी दीवानगी की हद्द पर न जा सुन ज़रा !
ये ज़िन्दगी तो क्या हर जन्म तेरे नाम किया !!

मौसम के साथ
वो भी बदल गए…
तारीफ उनकी की
वो पागल कह गए…

कोई इरादा ऐसा न करना,
जो न हो मुक़म्मिल तो जी न पाएं…
पाक वफ़ा की चाहा में फिर,
किसी बेवफा से मुलाकात हो जाए…

सोचा था वो Single है
पर वो Mingle निकली…
चल छोड़ “सागर”,
कोई और देखें…

मेरी आँखों में हैं तेरे मेरे प्यार के किस्से,
इन आँखों में ही कभी शाम ढल जाएगी…

ये Offer है या है मजाक
है क़बूल गर तो,
वक़्त बताओ कब आना
दीवाने हैं पागल ज़िद्दी भी…

गोया हम तो पागल जो इंतज़ार करते,
होटल में बैठ काफी पर काफी पीते हैं…
तुम हो की टाइम दे कर भूल जाती हो,
रात बैचैन दिन को बेकरार यूँ करते हो…

काश तू कुंआरी होती
छत पर बाल सूखा रही होती
गुज़रता तेरी गली से मैं
नज़र मैंने भी तुझपे मारी होती…

क्या खता थी ये तो बता
दिल चुरा गैर की क्यूँ हो गयी
हुस्न ओ जमाल की मूरत
काश तू हम पर दिल हारी होती…

नहीं होता तसव्वुर गैर का
आ मिल कोई रास्ता ही सुझा दे
मेरे ख्वाबों की तस्वीर तूही
ए खुदा यही तस्वीर हमारी होती…

यूँ रात भर जगाया न करो
प्यार है तो ख्वाबों में आया न करो..
करवटें बदलते रात गुज़रती
तकिया बन देखो यूँ सताया न करो…

वो और होते जिन्हें मुहब्बत में इंतज़ार पसंद,
यहाँ दिल लेने देने बाद ज़माने से लड़ना पसंद…
वो परवाना क्या जो शम्माँ को चाहे और डरे,
गर मुहब्बत करना आता तो निभाना भी आता…

यूँ जुल्फें खुली छोड़ तूने
क्या गुड नाईट कह दिया,
बाँहों में रात भर जगाया
और गुड मॉर्निंग कर दिया.

जब भी आता है तेरा हाथ मेरे हाथों में,
मेरे मुक़द्दर में और इजाफा हो जाता है…

उफ़ यूँ पलकें झुका ये क्या कुफर कर दिया,
न कहा न हाँ सारी उम्र का गुलाम कर लिया…

इन झुकी पलकों की खता है या मेरी,
जबसे देखा तुझे दिल दीवाना हो गया…

चाय की चुस्कियां हों और तेरा हाथ मेरे हाथ हो
तुम मुझे देखती रहो मैं तुम्हें और वक़्त रुक जाये…

इस दिल को भी खबर तुम्हारे दिल में क्या है,
मगर शर्म ओ हया कुछ ज़ुबाँ से कहने न देती…

आ करीब आ इस हया की चद्दर को उतार दूँ,
करीब खींच कर तुझे अपनी बाहों में सुला लूँ…

मेरे मेहबूब मुझे अपनी पन्हाओं में लेले…
ज़िन्दगी से महरूम हूँ बाँहों में लेले|

Tujhe jine ka shauk
mujhe marne ka
Isiliye teri yaadein
sath liye ja rha hun

तुम वो अधूरे ख्वाब हो
जब जब आते पूरा सा लगते

न छुप छुप देख मेरी प्रोफाइल को,
आ गया मुझ पे तेरा तो पछ्तायेगी…
तड़पेगी जागेगी रात करवटें बदल,
खुदा कसम मेरी नींद भी ले जाएगी…

तुम मानो या न मानो तुम्हारी मर्जी पर
तुम्हें प्यार किया है ज़िन्दगी से बाद कर

ये तेरी शर्बतों आँखें
डूबने को जी चाहता…
होंठों से छलकती मय
पीने को जी चाहता…
बला की खूबसूरत हो
घर लाने को जी चाहता…
दिल में बसा तुझ को
पूजने को जी चाहता…
ए चाँद उतर मेरे आंगन
देखने को जी चाहता…
शायर की ग़ज़ल सी हो
नज़्म कहने को जी चाहता…

झूठ बोलने की इतनी भी आदत ठीक नहीं यारा
फ़िक्र होती हमारी हर लफ्ज़ पर फ़िदा हो जाती…

कौन कम्बक्ख्त कहता है के दिल से निकाल
आँख मिले अब तो दिल से भुलाया न जायेगा…

किस बात का नाज़
किस बात पर मगरूर हो…
लगता किसी के प्यार
में चोट खाये ज़रूर हो…

जो गुज़र गई वो हवा हूँ मैं
जो तेरे साथ वो लम्हाँ हूँ मैं…

कभी आना मेरी गली मगर,
मैं हूँ या न हूँ इस बात का ख्याल रखना..
इतनी देर ना करना नगर,
जो गुज़र जाऊं तो फिर मलाल न करना…

वाक़िफ़ हूँ तुझ से तेरी बेवफाई से मैं
फिर भी मेरी सांसों की मेहबूबा है तू…

इक बार हीर बनकर तो देखो रांझे से कम नहीं हैं,
गर वफाओं में दम होगा हीर का राँझा ज़रूर होगा…

हर ख्वाहिश यहाँ मुक़म्मिल नहीं इक ख्वाहिश बाद,
टूटती सांसों पर भी कोई न कोई अधूरी रह ही जाती…

बात बेबात पर यूँ खुदा से कुछ न कुछ माँगा न करते,
उसे सब खबर है कब किसको क्या क्या कहाँ देना है…

यूँ सज धज आजकल रातों को तुम छत पर न आया करो,
बला की खूबसूरत हो कोई नादानी कर बैठेगा चाँद समझ…

अल्लाह ही बचाये इन हसीनों के नखरों से,
नाक पे गुस्सा आँखों में सपनें दिल बेकरार…

हम ना हों तो ये गुस्सा ये नशीली आँखें ये बेक़रारी किस काम की…
मुसीबत हैं माना मगर बिन मुसीबत ये जवानी तेरी किस काम की…

दिल में तो हाँ हाँ है मगर
ऊपर से न ना,
अब तो रब्ब ही इनकी
तीर ए नज़र से…

क्यों कराती हो मेरी सब दोस्तों में तौहीन,
यूँ मेरे ख्यालों में खो चाय न बनाया करो…
डर है कहीं मेरी नज़र ना लग जाए तुम्हें,
इतने प्यार से तुम यार चाय न बनाया करो…

किस्मत से मैं तेरे दिल के करीब हूँ,
वरना तरसे हैं कई मुझे पाने खातिर…

क्यों इतना हम पर भड़कती
लगता खाना आजकल कम खाती हो…
नहीं हिम्मत तो फाका न रखो
बात बात पर हमें खाने को दौड़ती हो…

गर वफाओं में जनून होगा
खुदा को भी तेरा मेरा मिलन क़बूल होगा…
इश्क़ कर उम्मीद भी रख
एक दिन सबको अपना रिश्ता मंजूर होगा…

न कर शरारत मेरे दिल से
आ गया तुझ पर तो पछ्तायेगी…
रात भर करवटें बदलेगी
तकिया बाहों पकड़ सहलाएगी…

जिन्हें इश्क़ होता सच्चा वो झूठ नहीं बोलै करते,
एक से वफ़ा की दुहाई दे दूजा रिश्ता न जोड़ा करते…

कोई शिक़वा नहीं शिकायत
जो भी मिला रब्ब की मेहर…
खूब गुज़रा यहाँ वक़्त”सागर”
जो भी गुज़रा जैसे भी गुज़रा…

आज मुहब्बत के जो मसीहा बनते,
पल पल हर किसी को Love u कहते…

अपनी दुआओं में शामिल रखना,
जाने किस मोड़ मुलाक़ात हो जाये…

न रूठें तुझसे तो मनाओगी किसे
प्यार बेशुमार जताओगी कैसे,
कहे तो सखियों संग दिल लगाएं
फिर अपना हमें बनाओगे कैसे…

उसे गरूर दिल न देने पर
हमें मगर चुराने की थी आदत…
ना न करते प्यार कर बैठी
दिल देने की जिसे थी न आदत…

एक तरफ है सारी खुदाई
एक तरफ माँ होती,
माँ के कदमों में ही”सागर”
असली ज़न्नत होती…

खुदगर्ज़ ज़माने में वफ़ा तलाश
न कर “सागर”,
लोग मिलते अब यहाँ बस
मतलब के लिए…

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Posted on January 30, 2022, in Shayari Khumar -e- Ishq. Bookmark the permalink. Leave a comment.

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