“लम्हें”



हाँ मैं शराबी हूँ पी है
तेरी आँखों के छलकते पैमानों से
लबों पर तबस्सुम की कहकशां से
सांसों की महकती खुशबु से
तेरे लौंग के लशकारे से
हाँ मैं शराबी हूँ पी है…
सुराहीदार गर्दन से
तेरी लचकती कमर से
यौवन भरी अंगड़ाई से
पैरों की झांझर से
हाँ मैं शराबी हूँ पैर है…

ना रखिये ज़मीं पर यूँ नाज़ुक कदम मैले हो जाएंगे l
कहती किसी दीवाने से फूल ज़मी पर ला बिछा देता ll

जो हाल उधर है तेरा वो हाल इधर मेरा भी है l
पलकें खुलें बंद रहें चेहरा तेरा ही नज़र आता ll

सत्ता का नशा.!!

जब तक है ज़िन्दगी
कुर्सी मैं न छोडूंगा l
कुर्सी की चाहत ऐसी
सारे रिश्ते भूलूंगा ll

चल पंछी वापिस उन घरोंदों को जहाँ तेरा रेन बसेरा l
इन ऊँची ऊँची इमारतों में ज़ज़्बातों की कीमत कोई नहीं ll

सुना था प्यार में लोग पागल हो
अंधे हो जाते देख भी लिया /
सबूत पर सबूत मिलने बाद भी
कोई आबरू लुटाने को तैयार //

अतीत याद रखना
चाहिए,किन्तु अतीत
में जीना नहीं चाहिए
उससे प्रगति रुक जाती l

उफ़ क्या गुनाह किया
उनसे तस्वीर मांग /
इतरा बोले मेरे पास नहीं
मुस्कुरा चल दिए //

खुदा हुस्न देता तो
नज़ाकत दे ही देता /
इश्क़ को तड़पाने की
आदत दे ही देता //

मिलना फिर बिछड़ना फिर मिलना न हो तो /
मुहब्बत के फलसफां सब मशहूर न हो जाते //

शक्ल तेरी तो देख ली खूबसूरत है /
काश दिल देखने जा आइना होता //

दुआ कभी तुम अच्छी भी मांग लिया करो /
है मुहब्बत तो कभी इज़हार कर दिया करो //

गर मुहब्बत हो पाक हर बात मेहबूब की अच्छी लगती /
वैसे इश्क़ में कैसी खता क्या गिला इसमें भी मुहब्बत होती //

ज़िन्दगी गुजर सकती तेरी
पान्हाओं तो अच्छा था /
जब मुकद्दर ही साथ न हो
फिर तेरा गुन्हा क्या था.//

ना दिन का चैन है अब
ना रातों को क़रार हमें /
सुनाते हमें दीवाने हुए,
तुम्हारे इश्क़ में सनम //

क्यों रातों को चुपचाप
छुप कर सो जाता है /
चल छत पर आ तुझे
चाँद बहाने देख लूंगा //

मार डालेगी तुझे
ये साइंस की पढ़ाई /
बदले में मिलेगी
लगता मेरे को जुदाई //

कभी रात दिन तुम भी हमारी तरह रहा करो /
उठते बैठते और ख्यालो में भी याद किया करो //

तेरा दिल तो नादाँ है,
मेरे दिल से गुस्ताखियाँ न करा /
न आ यूँ करीब और करीब,
तेरी सांसों से डर लगता //

हमनें देखा है ज़माने को बड़े करीब से /
ज़िन्दगी वही जो तेरे साथ बसर होती //

ए हुस्न मुझे यूँ
बेबाक नज़रों से न देख l
फरिश्ता नहीं हूँ
न जाने कब बहक जाऊँ ll

आगे से न लोगी,
पीछे से भी न लोगी /
तो क्या रिश्वत,
टेबल के नीचे से लोगी //

चाँद सितारों की ख्वाहिश की.
जो मिला उसी को सरहाया
फिर भी बेरहम था…
गैर की हो गैर निकली वो मूरत
जिसे चाहा शिद्दत से अफ़सोस
शायद वक़्त बेरहम था…
वतन खातिर जां देने की तमन्ना
मगर दिल की दिल रही हसरत
ज़माना जो बेरहम था…

ज़िन्दगी तेरी बाँहों में यूँ ही
गुज़र जाए तो अच्छा /
मगर हर किसी की ख्वाशीषें
मुक़म्मिल तो न होती //

About Dilkash Shayari

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Posted on December 5, 2020, in लम्हें. Bookmark the permalink. Leave a comment.

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