“लम्हें”


किस बात का है गरूर
तड़पाया न करो..
अब यूँ पानी में भी आग
लगाया न करो…

जो फूल दिए तूने किताबो में रखे थे
वक़्त गुज़रे तेरी यादों के खत बन गए..
पढ़ता हूँ रोज़ ​जब तेरी याद सताती…

ज़िन्दगी के क़ाफ़ले में तन्हा ही रहे..
लोग मिलते रहे बिछड़ जाने के लिए…

मुसाफिर हूँ दो पल का
जाने कब चले जाना..
न ठोर न ठिकाना पता
अधूरा कुछ रह जाना…

सितारों उनसे कह दो मुहब्बत करके तो देखें,
इतने बुरे नहीं मर कर ही साथ छोड़ेंगे उनका…

न कर तीर ए नज़र का इस्तेमाल यूँ.
घायल हो दिल और ज़ख्म भी न भरे…

हर लड़की एक सी
जैसी मेरी माँ की..
छाती
सबको एक सी…

उन्हें भूलना ही बेहतर..
जो याद रखने लायक नहीं…

तुम आओ तो सही इक बार यार..
देखो ज़िन्दगी कैसे निखर जाती है…

क्यों कर करे सज़दा
इतना भी तल्बगार नहीं..
गर तू है पूरी बेवफा
तो हम भी तेरे यार नहीं..

नशेमन हूँ जब से देखा है मदहोश ही रहने दो..
आँखों के मैखाने में ज़िन्दगी बसर कर लेने दो…

उन्हें दावा था हमसे मुहब्बत का
मगर महफ़िल में रुस्वा करते गए..
जो बातें हमसे तन्हाई में करते थे
सर ए बाजार नुमाइश करते गए…

गर मुहब्बत तुमने दिल से की होतो..
प्यार हम भी फिर शिद्दत से निभाते…

बाली उम्र है माना मगर फिर भी सम्भल रहा करो..
यूँ झुल्फों की क़यामत सरे राह न बिखराया करो…

जवानी में यारो जब जब चढ़े
इश्क़-ए-ज़नून ..
पल्ट घर के कांच की खिड़कियाँ
भी देख लेना…

तेरी सांसों की खुशबु से तेरा पता पहचान लेते.!
जान ए जहाँ कुछ इस तरह तेरा घर तलाश लेते.!!

मॉ से बेहतर न कोई हुआ हैं न होगा..
जो न हुआ मैं का और का क्या होगा…

जब से तुझे देखा है हम अपना दिल हार गए..
जान-ए-जां तेरी आँखों में खुद को निहार गए…

की जब से देखा तुझे दिल बेताब सा रहता है..
दिन रात करवटें बदलते इंतज़ार सा रहता है…

बस मुंह फुला कर ही रहना
दूजा काम तो आता न,
कोई न प्यार किया है तो
नखरे भी तो उठाने होंगे…

माना के तेरी नज़रों का नूर ए नज़र नहीं..
मगर ये सांसें तेरी खुशबु की तलबगार हैं…

जब से तुझे देखा है हम अपना दिल हार गए..
जान-ए-जां तेरी आँखों में खुद को निहार गए…

मैं इक दूर का ख्वाब हूँ..
देखना अब बंद कर दो…

मेरी मुस्कुराने की वजह तुम हो..
मगर तुम तो धोखेबाज़ निकले…

न कर हुस्न की नुमाइश यूँ..
हर कोई मरने वाला नहीं…

इस क़ाबिल कहाँ की मेरी दुआओं में शामिल हो..
एक वक़्त था तुझे चाहा था सांसो से भी बढ कर…

न कर पलकें झुका एहतराम यूँ..
मेरा खुदा जनता तू ही मेहबूब है…
जो किया कोई वादा न निभा सके,
वो चले हैं वादा ए वफ़ा करने फिर…

ब्स मुंह फुला कर ही रहना
दूजा काम तो आता न,
कोई न प्यार किया है तो
नखरे भी तो उठाने होंगे…

न कर पलकें झुका एहतराम यूँ..
मेरा ईश्वर जनता तू ही मेहबूब है…

रंज नहीं इसका किसी ने क्या दिया,
जो भी दिया खूब दिया भरपूर दिया…

ख्याबों की दुनियां में कुछ ख्वाब अधूरे हैं,
फिर भी इस जीवन में फेहरिश्त लम्बी हैं…

दगदरों की कमी नहीं इस जहाँ में,
फिर भी क्यूँ लोग इश्क़ किया करते…

इस क़ाबिल कहाँ की मेरी दुआओं में शामिल हो..
एक वक़्त था तुझे चाहा था सांसो से भी बढ कर…

अब तो किताबों में रखे फूल भी सूखने लगे..
जिनमें तेरी सूरत देख सीने से लगा रखा था…

बस मुंह फुला कर ही रहना
दूजा काम तो आता न,
कोई न प्यार किया है तो
नखरे भी तो उठाने होंगे…

यूँही साल पर साल गुज़र जायेगा
देखते देखते तीन साल गुज़र जायेगा..
फिर होगी मिलना की घड़ी जानम
बाँहों में उम्र का शबाब गुज़र जायेगा…

Posted on August 21, 2020, in Shayari Khumar -e- Ishq. Bookmark the permalink. Leave a comment.

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